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Abhi Na Parda Giraao_ Movie: Shaque

vasant desai

Vasant desai

Audio devices were often seen in art films where the filmmakers used them as a good excuse to play a music piece of a legendary artist ..They depicted the protagonists as lovers of music and played music that I feel they ( directors) enjoyed. I am reminded of a sequence in Bhumika where Amrish puri is listening to a Thumri when smita patil walks in. Another sequence is a cute one in Kitaab where Uttam kumar is listening to Pt Ravi shankar when Master Raju walks in..He asks Raju. “Do you know who this is? .This is pt Ravi shankar, the world famous sitarist.”. Immediately sparks go off in Raju’s little brain- “Thats what I should do to get out if this school rut!. learn sitar!..”Ravi shankar ne sitar seekhne ke liye Geography thode hi padha hoga?!” he mumbles, pleased at his reasoning….and there are many more such examples. ..
In other instances filmmakers used audio devices to make songs seem real life..
And then in this sequence in Shaque this Kakaji is shown playing his recorded song to Shabana as he sings along…You can get a glimpse of the recording device at the begining.
https://www.youtube.com/watch?v=e5fHC1hYUPM

-courtesy : Medha Gawai

Shaque, Vasant Desai, J K Banerjee, Aruna Vikas, recording device
 
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Posted by on December 12, 2014 in info and facts

 

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zohrabai ambalewali’s interview

zohrabai ambalewali’s interview

दूरदर्शन के पुराने कुछ एक साक्षात्कारों को जानकारी के खजाने के तौर पर देखा जा सकता है, जहाँ एक फनकार खुद अपनी ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से रूबरू कराता था. चूंकि आज के दौर में इन्टरनेट भी जानकारी का अच्छा खासा खज़ाना लिए है और थोड़ा गोता लगाने पर कभी कभी कुछ दुर्लभ मोती हाथ लग जाते हैं. आज ऐसे ही एक मोती , स्वर निधि से आपकी मुलाक़ात कराएँ,  जिसने सिने  पर्दे के शुरूआती सालों में  हिंदी फिल्मो के लिए अपनी आवाज़ भरी . नाम था  ज़ोहराबाई  अम्बालेवाली .

पढ़ें  अनीता सिंह के साथ ज़ोहरा बाई अम्बालेवाली की इसी बातचीत के कुछ एक अंश .   Read the rest of this entry »

 
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Posted by on October 17, 2014 in Articles, info and facts

 

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टिंकु टैगोर

हिंदी फिल्मों में हमने कई दफा अदाकारों के बच्चों और भावी पीढ़ी को उनकी उस विरासत को आगे बढ़ाते हुए देखा .कुछ उसमे सफल हुए तो कुछ अपने से पहले के लोगों के बनाये तिलिस्म को तोड़ पाने में नाकामयाब हुए और गुमनामी में चले गये .लेकिन इसके इतर भी कुछ रहे जिन्होंने काफी कम समय के लिए चाहते न चाहते हुए बड़े परदे का रुख किया .

सिनेपर्द पर उस अभिनेत्री को कौन भूल सकता है जिसकी आँखें उसके होंठों से पहले ही काफी कुछ कह जाती थी ,जिसकी संवाद अदायगी और उनका वो लहजा बाक़ी अभिनेत्रियों से उन्हें अलग कर देता .ये अभिनेत्री रही टैगोर परिवार की शर्मीला .पर आज बात शर्मीला की नहीं बल्कि उनकी छोटी बहन उइन्द्रिला टैगोर (टिंकू ) की .

काफी छोटी रहीं टिंकू जब उन्हें (सन 1956-57) बंगाली फिल्म ‘काबुलिवाला‘ में नटखट बालकलाकार की भूमिका में देखा गया .ये बतौर अभिनेत्री उनकी एकमात्र फिल्म रही.

इनपुट : अरुनभ रॉय


 
 

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